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मुस्लिम शासन को सुदृढ़ बनाने के लिए किस माध्यम का प्रयोग किया गया ?

मुस्लिम शासन को सुदृढ़ बनाने के लिए किस माध्यम का प्रयोग किया गया ?
अभ्यास विधि (Practise Method) – कला कौशल की शिक्षा के लिए कौशलों का शिक्षक द्वारा प्रदर्शन किया जाता था, फिर छात्र उसी के अनुसार स्वयं उस कौशल का बार-बार अभ्यास करते थे ।
(य) अनुकरण विधि (Imitation Method) –
प्राथमिक स्तर पर छात्रों को कुरान शरीफ की आयतों की शिक्षा अनुकरण विधि द्वारा प्रदान करते थे । शिक्षक उच्च स्वर में आयतों का उच्चारण करते थे, छात्र सामूहिक रूप से उसका अनुकरण करते थे । अनुकरण विधि द्वारा हस्तलेख भी सुन्दर बनाया जाता था । लकड़ी की तख्ती पर सरकंडे की कलम के द्वारा पहले शिक्षक लिखता था, फिर छात्र उसे देखकर लिखते थे तथा अनुकरण करके अपना लेख सुधारते थे ।
5.4.7 अनुशासन
मुस्लिम काल में कठोर अनुशासन की व्यवस्था थी । आत्मानुशासन, सामान्य शिष्टाचार तथा विनम्रता का व्यवहार अनिवार्य था । मकतबों तथा मदरसों में झूठ बोलने, दैनिक पाठ याद नहीं करने, अनैतिक तथा अशिष्ट आचरण करने पर छात्रों को कठोर शारीरिक दण्ड देने की प्रथा थी । मुर्गा बनाना, बेंत तथा कोड़े से मारना, लात घूसे मारना आदि दमनात्मक अनुशासन विधियों का प्रचलन था कुशल तथा योग्य छात्रों को पारितोषिक दिये जाते थे ।
5.4.8 गुरू-शिष्य सम्बन्ध
मुस्लिम काल में भी अध्यापक एवं छात्र के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध थे । शिक्षक छात्रों से स्नेहपूर्ण व्यवहार करते थे । शिक्षकों के परिश्रम से पढ़ाने के कारण शिष्य उनका सम्मान करते थे, उनके आदेशों का पालन करते थे । शिक्षक को ‘उस्ताद’ कहा जाता था । इस्लाम धर्म के अनुयायी तथा अरवी-फारसी के विद्वान ही शिक्षक के पद पर नियुक्त किये जाते थे । शिक्षकों को भारी वेतन मिलता था तथा वे ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे । छात्रों को ‘शगिर्द’ कहा जाता था । उनको कठोर अनुशासन में रहना होता था । मदरसों के साथ छात्रावास की व्यवस्था भी होती थी अत: अध्यापक एवं छात्र में व्यक्तिगत सम्पर्क भी रहता था। बाद में गुरू-शिष्य की घनिष्ठता कम होती चली गई । स्वमूल्यांकन प्रश्न 1. मध्यकालीन शिक्षा की मुख्य शिक्षण विधियाँ क्या थी? 2. मुस्लिम शासन प्रणाली में अनुशासन व्यवस्था कैसी थी? | 3. मुस्लिम कालीन शिक्षा व्यवस्था में गुरू शिष्य सम्बन्ध कैसे थे ?
5.4.9 शिक्षा का माध्यम
मुस्लिम काल में राज्य की भाषा फारसी थी । “गुनार मिरडल” के अनुसार – “उच्च स्तर पर शिक्षा का माध्यम अरबी एवं फारसी भाषा थी । अरबी तथा फारसी भाषा के मिलने से उर्दू भाषा की उत्पत्ति हुई । मुस्लिम शिक्षा केन्द्रों की भाषा अरबी तथा फारसी ही थी ।
5.4.10 स्त्री शिक्षा
मुस्लिम काल में पर्दा प्रथा का प्रचलन होने के कारण स्त्री शिक्षा का समुचित विकास नहीं हुआ | छोटी आयु की बालिकाएँ तो मकतबों में जाकर प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त कर लेती थीं, किन्तु उच्च शिक्षा की सुविधा उपलब्ध नहीं थी । शासन की ओर से स्त्रियों की उच्च शिक्षा का कोई प्रबन्ध नहीं था । इस कारण निर्धन परिवारों की स्त्रियाँ उच्च शिक्षा से वंचित रह जाती थी

अमीर घरानों की स्त्रियों को उनके घर पर ही व्यक्तिगत रूप से शिक्षा प्रदान की जाती थी । उनको धर्म, साहित्य, नृत्य, संगीत एवं ललित कलाओं की शिक्षा दी जाती थी । इनमें राजघरानों की स्त्रियों जैसे रजिया सुलतान, नूरजहाँ, जेबुन्निसा बेगम आदि के नाम उल्लेखनीय हैं । कहीं कहीं मदरसों की व्यवस्था भी की गई थी । ‘फरिश्ता’ के अनुसार – ‘ ‘इस मदरसे में बालिकाओं को नृत्य, संगीत, सिलाई, बुनाई, बढ़ईगिरी, सुनारगिरी लुहारगिरी, जूते बनाने, मखमल बनाने, युद्ध-कला, रण-क्षेत्र कला आदि की शिक्षा दी जाती थी । उनकी शिक्षा का भार उनके अभिभावकों को वहन करना पड़ता था । अत: धनी व्यक्ति ही अपनी बालिकाओं को अध्ययन के लिए इन विद्यालयों में भेज पाते थे । राजघरानों एवं अमीर वर्गों की स्त्रियों में शिक्षा का प्रचलन था किन्तु सामान्य वर्ग की स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार नहीं हुआ था । इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए डा० एफ० ई० केई ने लिखा है – “मुस्लिम स्त्रियों के विशाल जनसमूह को पारिवारिक कर्तव्यों को करने के लिए घरेलू प्रशिक्षण के अतिरिक्त किसी भी प्रकार की शिक्षा प्राप्त नहीं हुई ।”
5.4.11 परीक्षा प्रणाली
इस काल में किसी भी औपचारिक परीक्षा प्रणाली का विकास नहीं हुआ था । जब शिक्षक के द्वारा दिये गये ज्ञान को छात्र समझ जाते थे तो शिक्षा की समाप्ति मानी जाती थी। असाधारण ज्ञान एवं योग्यता के प्रदर्शन के लिए छात्रों को काबिल, आलिम तथा फाजिल की उपाधि प्रदान की जाती थी । साहित्य के छात्रों को ‘काबिल’ धर्म शास्त्र के छात्रों को आलिम तथा तर्कशास्त्र एवं दर्शन शास्त्र के छात्रों को ‘फाजिल’ की उपाधि से अलंकृत किया जाता था । राजदरबार में नौकरी पाने के लिए छात्रों को अपनी योग्यता का प्रदर्शन दरबारियों के समक्ष करना पड़ता था ।
5.5 मध्यकालीन शिक्षा के दोष (अ) स्त्री शिक्षा की उपेक्षा (Negligence of Women Education) –
पर्दा प्रथा का प्रचलन होने के कारण मुस्लिम काल में स्त्री शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार सम्भव नहीं हो सका । सामान्य घरों की बालिकाएँ अपने निकटतम मकतबों में थोड़ा-थोड़ा पढ़नालिखना सीख लेती थीं । अमीर वर्ग एवं राजघरानों की स्त्रियाँ घर पर ही शिक्षा ग्रहण करती थीं । मुस्लिम काल में स्त्री शिक्षा की उपेक्षा के सम्बन्ध में टी० एन० सिक्वेरा ने कहा है – “स्त्रियों की शिक्षा पढ़ने और लिखने तक की संकुचित स्थिति में पहुँच गई थी ।”
लौकिक शिक्षा पर अधिक बल (More Emphasis on Wordly Education) –
इस्लाम धर्म पारलौकिक जीवन की अपेक्षा लौकिक जीवन को अधिक महत्व देता है। क्योंकि ये पुनर्जन्म के अस्तित्व को नहीं स्वीकारते । इसी कारण शिक्षा के उद्देश्य भी भिन्न थे । शिक्षा का मुख्य उद्देश्य छात्र को ज्ञान सम्पन्न करके समाज में यश तथा राज्य में उच्च पद प्राप्त करने की योग्यता प्रदान करना था ताकि छात्र समस्त सांसारिक सुख एवं एश्वर्यों की प्राप्ति तथा उपभोग कर सके | इस उद्देश्य से प्रेरित होकर छात्र कठिन परिश्रम दवारा ज्ञानार्जन करके योग्यता वृद्धि के लिए प्रयासरत रहते थे ।
लोक भाषाओं की उपेक्षा (Negligence of Vernaculars) –
मुस्लिम शिक्षा प्रणाली में अरबी तथा फारसी भाषा को ही अधिक महत्व दिया जाता था । मकतबों में फारसी वर्णमाला सिखायी जाती थी तथा कुरान की आयतें रटाई जाती थी | मदरसों में उच्च शिक्षा का माध्यम फारसी भाषा थी । उच्च पदों पर आसीन होने के लिए हिन्दुओं को भी अरबी तथा फारसी का ज्ञान अनिवार्य था । इस कारण भारतीय लोक भाषाओं को बल नहीं मिला तथा उनकी अत्यधिक उपेक्षा हुई।

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