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फ्रांस में वाणिज्यवाद

 फ्रांस में वाणिज्यवाद

चीनी, रेशमी वस्त्रों तथा भारतीय सूती वस्त्रा के आयात पर अंकुश लगाया गया क्योंकि ये चीजें ऊनी वस्त्रों की ब्रिकी पर हानकारक प्रभाव डालती थीं। इस युग में मशीनों के निर्यात पर भी रोक लगाई गयी तथा १५ कुशल शिल्पियों को इंग्लैण्ड आकर बसने को प्रोत्साहित किया गया। इस प्रकार २ फ्रांस वाणिज्ययादी नीतियों के तहत फलता-फूलता रहा।
फ्रांस के वित्तमंत्री कोल्बर्ट (1661-1683 ई.) ने फ्रांस में वाणिज्यवादका के व्यावहारिक प्रयोग में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । फ्रांस में वाणिज्यवाद का पाण कालबटवाद के नाम से पुकारा जाने लगा। फ्रांस में कोल्बर्ट से जुड़ी हुइन की पहली विशेषता यह थी कि आंग्ल वाणिज्यवादियों की तरह कोल्बटन था कि व्यापार संतुलन अनुकूल रहे, सोने-चाँदी के संग्रह को इस अनुकूलता माना जाय और व्यापारिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ शक्ति का इस्तेमाल किया नीति की दूसरी विशेषता यह थी कि औद्योगिक उत्पादन का नियमन के पीछे अनेक उद्देश्य थे-जैसे कृषि के अलावा अन्य साधनों का विकास प्रतिद्धद्धिता को ध्यान में रखते हुए उत्पादित वस्तुओं की गुणवत्ता में सुध ज्यवाद की नीतियों वाणिज्यवाद को उसके नाम से जुड़ी हुई नीतियों तरह कोल्बर्ट भी यह मानता  अनुकूलता का संकेतक तमाल किया जाए। कोल्बर्ट का नियमन हो। इस नियमन ना का विकास करना, विदेशी धार करना, ग्रामीण क्षेत्र के योग्य तथा शारीरिक दृष्टि से समर्थ गरीबों को रोजगार प्रदान करना ताकि वे सामाजिक असंतोष के कारण न बनें।

फ्रांस के वाणिज्यवाद

फ्रांस के वाणिज्यवाद के सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि लुई चौदहवें के शासन और उसके बाद के काल में आर्थिक नीति निर्धारण का कार्य नौकरशाही ने किया जबकि इंग्लैण्ड में वहाँ के व्यापारी समाज के सदस्यों ने वाणिज्यवादी नीतियों को स्वरूप देने में अहम् भूमिका निभाई । फ्रांस की नौकरशाही में मध्यवर्गीय बुर्जुआ मूल के थे । यह स्मरणीय है कि इन लोगों ने अपने पद खरीदकर प्राप्त किये थे । अतः इस वर्ग की रुचि उत्पादक उद्यम को बढ़ावा देने में नहीं रही। इनका मुख्य कार्य कर-संग्रहकर्ताओं, साहूकारों आदि के रूप में रहा । यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि अठारहवीं सदी का फ्रांस नवीन आविष्कारों से भरा पड़ा है किन्तु उनका विकास एवं व्यावहारिक इस्तेमाल इंग्लैण्ड तथा स्कॉटलैण्ड में किया गया। इसका प्रमुख कारण यह था कि वहाँ सरकारी बाधाएँ अधिक थीं। यदि इन आविष्कारों का फ्रांस में उपयोग हुआ होता तो फ्रांस के उद्योगों को त्वरित गति मिलती । फ्रांस ने भी कालान्तर में उपनिवेश स्थापित करने तथा एशिया के पिछड़े देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने की नीति का अवलम्बन किया जिसके परिणामस्वरूप उसे इंग्लैण्ड से कई बार संघर्ष करना पड़ा।

स्पेन

स्पेन में वाणिज्यवादी नीति पर अधिक बल दिया गया किन्तु स्पेन में आंतरिक अर्थव्यवस्था को सुधारने की कोशिश नहीं की गयी । स्पेनवासियों ने सोने-चाँदी के संग्रह को विशेष महत्व दिया और इसके लिए उन्होंने उन सभी साधनों का उपयोग किया जिनके द्वारा सोना-चाँदी प्राप्त किया जा सकता था। इसके लिए उन्होंने औपनिवेशिक साम्राज्य का विस्तार किया और उपनिवेशों का अत्यधिक आर्थिक शोषण भी किया | सम्राट चार्ल्स पंचम (1516-1556 ई.) के काल में अमेरिका और वेस्ट इण्डीज से अपार धनराशि स्पेन आई। नीदरलैण्ड्स और इटली से भी स्पेन को काफी धन प्राप्त हुआ किन्तु आन्तरिक सम्पन्नता के अभाव के कारण देश में कुछ धन न बच पाता था।
स्पेन का औपनिवेशिक साम्राज्य बहुत विशाल था, पर इन उपनिवेशों के प्रति स्पेन की नीति त्रुटिपूर्ण थी । उपनिवेशों पर तरह-तरह के प्रतिबन्ध लगे हुए थे, वे किसी दूसरे देश से व्यापार नहीं कर सकते थे, जबकि स्पेन स्वयं उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाता था। ऐसी स्थिति में उपनिवेश अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए चोरबाजारी जैसे साधनों का सहारा लेते थे। इससे स्पेन को आर्थिक हानि पहुँचती थी। उपनिवेशों से प्राप्त धन का अधिकांश भाग लूटपाट और विदेशी पूँजीपतियों के हाथ में चला जाता था। वैसे भी जब तक देश में ही उत्पादन का आधार मजबूत न हो, बाहर से लाया गया धन केवल विलासिता बढ़ाता है और देश के अर्थ-तन्त्र को दूसरों पर निर्भर बनाता है।

वाणिज्यवाद का मूल्याँकन

वाणिज्यवाद आर्थिक विचारधारा के क्षेत्र में एक महान् क्रान्ति थी जो यूरोप के देशों में लगभग 250 वर्षों तक विद्यमान रही । एक ऐसे समय में जब मध्यकालीन सामन्तवाद की स्थापना का विचार इन  तथा चर्च प्रधानतावाद पर जोर था, एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना का मध्यकालीन प्रथाओं की समाप्ति के लिए अनिवार्य था। इसके अतिरिक्त विदेशी के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने तथा अनुकूल व्यापार संतुलन के विचार को कर करने के लिए देश में व्यापार, उद्योग, वेतन, उपभोग इत्यादि का राज्य द्वारा किया जाना आवश्यक था। अधिक निर्यात करने हेतु विदेशों में उपनिवेशों की या भी आवश्यक थी। ये सब कार्य राज्य को शक्तिशाली बनाकर ही किये जा सकते थे। प्रकार वाणिज्यवाद को आर्थिक क्षेत्र में राज्य निर्माण की विचारधारा तथा नीति करना गलत न होगा।

वर्तमान पूँजीवाद की स्थापना

इस काल में वर्तमान पूँजीवाद की स्थापना हुई थी। वाणिज्यवाद के अन्तर्गत विदेशी व्यापार पहली बार बड़े स्तर पर होना आरम्भ हुआ था तथा यह कहना उपयुक्त होगा कि वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का इतिहास वाणिज्यवाद से ही आरम्भ होता है। व्यापार ने अन्य तत्वों के साथ मिलकर औपनिवेशिक व्यवस्था को जन्म दिया ।

वाणिज्यवाद अथवा वाणिज्यिक क्रान्ति

वाणिज्यवाद अथवा वाणिज्यिक क्रान्ति का एक महत्वपूर्ण प्रतिफल औद्योगिक क्रान्ति का प्रादुर्भाव था, जो अठारहवीं सदी के अन्तिम चरण में यूरोप में शुरू हुई । अधिक से अधिक माल तैयार करने की प्रवृत्ति ने यूरोप के शिल्पियों को इस बात के लिए प्रेरणा दी कि वे उत्पादन के नए तरीकों का विकास व व्यवहार करें। वाणिज्यिक क्रान्ति के फलस्वरूप मध्यम वर्ग के व्यक्तियों की संख्या और ताकत में काफी वृद्धि हुई। उन्हें व्यापार और व्यवसाय द्वारा समृद्ध होने का अनुपम अवसर प्राप्त हुआ। धर्मसुधार ने भी मध्यम वर्ग की ताकत को बढ़ाया था। इसी वर्ग ने चर्च की भूमि का बहुत बड़ा भाग खरीद कर अपनी स्थिति को मजबूत बना लिया था। इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाने की जरूरत नहीं है कि इस वर्ग में आत्म-सम्मान और अपनी पहचान की जो भावना इस समय प्रादुर्भूत हुई थी. उसने ही फ्रांस की राज्य क्रांन्ति का मार्ग प्रशस्त किया था।
सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री कीन्स ने अपनी पुस्तक ‘जनरल थ्योरी’ में वाणिज्यवादियों की प्रशंसा की है। कीन्स के मतानुसार वाणिज्यवादियों ने, शासन-कला (स्टेटक्राफ्ट), जा समस्त अर्थव्यवस्था की समस्याओं तथा समस्त उत्पादन कारकों के अधिकतम उपयाग से सम्बन्धित है, की नींव डाली थी।

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