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फ्रांस की गद्दी पर लुई चौदहवाँ

फ्रांस की गद्दी पर लुई चौदहवाँ

ऐसे समय फ्रांस की गद्दी पर लुई चौदहवाँ आसीन था । परिस्थितियाँ उसके अनुकूल दी। तुई अपने शासनकाल में केवल शुरू के छः वर्ष शान्ति से रह सका । बाकी आधी सवादी तक वह निरन्तर युद्धरत रहा । फ्रांस को विशिष्ट स्थिति में लाने हेतु उसने कुल चार बड़े युद्ध किये। उसने प्रथम तीन युद्ध फ्रांस की सीमाओं के विस्तार के लिए लड़े जबकि चौथा युद्ध स्पेन के सिंहासन पर अपने वंश के सदस्य को बैठाने के लिए लड़ा। तुई क्रास की सीमाओं का विस्तार इसलिए चाहता था कि उसे प्राकृतिक सीमाएँ मिल जायें। जिसका अर्थ था आल्पस पर्वत का पश्चिमी क्षेत्र, उत्तरी सीमा के लिए राइन नदी का क्षेत्र, दक्षिण-पश्चिम में पिरेनीज पर्वत तक का बड़ा भू-भाग फ्रांस के अधिकार क्षेत्र में

डेदोल्यूशन का युद्ध (1667-68 ई.)

यह पहला युद्ध स्पेन के विरुद्ध लड़ा गया । स्पेनी नीदरलैण्ड (बेल्जियम) में एक परम्परा थी कि यदि किसी की कई शादियाँ हों तो पहली शादी से हुई सन्तान को, मले ही वह लड़की हो. उत्तराधिकार में प्राथमिकता मिलती थी। यह क्षेत्रीय परम्परा थी और केवल व्यक्तिगत सम्पत्ति के मामलों में लागू होती थी। लुई ने इस परम्परा का बड़ा लड़की उसकी पत्नी थी मी की ओर से पूरे स्पेनी नीदरलैण्ड कर शक्ति के बल पर इस्तेमाल किया । स्पेन के शासक की पहली पत्नी से इसलिए जब उसका श्वसुर मरा तो उसने अपनी पत्नी की और पर अपना हक बताया । यद्यपि यह हास्यास्पद था। उसने हमला कर शक्ति कब्जा करना चाहा। इस समय यूरोप के अन्य राज्य अपनी समस्या होलण्ड, स्वीडन और अन्य कई प्रोटेस्टेन्ट राज्यो को उसने कूटनीति से था। पतनोन्मुख स्पेन में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह लुई की विजयिनी सेना की समस्याओं में उलझे हुए थे। कटनीति से तटस्थ बना लिया की विजयिनी सेनाओं को रोक सके।

एक्स ला शापेल की संधि

लई की जीत ने उत्तर के राज्यों को भयभीत कर दिया। उन्हें अपनी स्वतन्त्रता खतरे में दिखायी पड़ी । परिणामस्वरूप एक अप्रत्याशित बात हो गयी। और इंग्लैण्ड ने, जो परस्पर लड़ रहे थे, आपस में समझौता कर लिया । स्वीडन और इंग्लैण्ड तीन प्रोटेस्टेन्ट देशों ने मिलकर अब तक के अपने शत्रु कैथोलिक स्पेन की मदद करने के लिए त्रिगुट बना दिया । लुई ने बुद्धिमानी का परिचय देते हुए युद्ध रोक दिया । उसने 1668 ई. में ‘एक्स ला शापेल की संधि’ कर ली । संधि के द्वारा उसे फ्रेंच कोम्टे का क्षेत्र लौटा देना पड़ा लेकिन उत्तरी सीमा पर एक बहुत बड़ा भू-भाग फ्रांस को मिल गया । आज के फ्रांस के औद्योगिक नगर लील्ल, तूर्ने और शार्लरूआ इसी संधि की उपलब्धि हैं | इस प्रकार, इस युद्ध द्वारा लुई को फ्रांस की सीमाओं का थोड़ा विस्तार करने में सफलता मिली और यूरोप में फ्रांसीसी सेना का वर्चस्व स्थापित हुआ।

(ii) हॉलैण्ड से युद्ध (1672-78 ई.)

लुई को लगा कि उसे एक बड़ी विजय से यदि वंचित रहना पड़ा तो इसका कारण हॉलैण्ड है क्योंकि उसी के प्रयासों के कारण उसके विरुद्ध गठजोड़ सम्भव हुआ था इसके अलावा हॉलैण्ड से युद्ध के अन्य कारण भी थे-पहला, हॉलैण्ड औपनिवाशक व्यापारिक क्षेत्र में भी उसका बड़ा प्रतिद्वन्द्वी था । दूसरा, हॉलैण्ड का दमन कर उत्तर पूर्व की ओर फ्रांस की सीमाओं का विस्तार करना संभव न था। तास सताये हुए कई प्रोटेस्टेन्ट हॉलैण्ड में रह रहे थे । चौथा, हॉलैण्ड की आता अच्छी नहीं थी और वहाँ राजतन्त्रवादियों और गणतंत्रवादियों में संघर्ष  का आन्तरिक स्थिति का तोड़कर हॉलैण्ड को आर स्वीडन को धन के बलबूत ऐसी स्थिति में लुई ने हॉलैण्ड पर आक्रमण करना आवश्यक समझा।

हॉलैण्ड पर आक्रमण

हॉलैण्ड पर आक्रमण करने से पूर्व लुई ने पुराने त्रिगुट को ताड़कर मित्रहीन बनाने का कदम उठाया और दो सदस्यों इंग्लैण्ड और स्वीडन पर अपने पक्ष में मिला लिया । हॉलैण्ड पर आक्रमण कर दिया। लुई ने स्वयं नेतृत्व किया त्युरेन और लक्जेमवर्ग के ड्यूक के नेतृत्व में तीन सैनिक टुकड़िया फ्रांस की सेनाएँ जीतती चली गयीं। हॉलैण्ड-शासक विलियम ने कूटन उसने आस्ट्रिया, बैन्डेनबर्ग और स्पेन से सन्धि कर ली। इंग्लैण्ड का प्रा ने भी शासक की मर्जी के विरुद्ध हॉलैण्ड की मदद करने का निणय तृत्व किया। कोंदे दुकाइयों ने हमला किया। नकूटनीति से काम लिया की प्रोटेस्टेन्ट पार्लियामेन्ट निर्णय लिया । अब हॉलन अकेला नहीं था । लुई की जीत भी निर्बाध नहीं थी। लुई का प्रसिद्ध सेनापति त्यूरेन मारा जा चुका था। दोनों पक्ष युद्ध करते हुए थक गये थे। ऐसी परिस्थिति में लुई ने संधि का निर्णय लिया।

निमेजन की संधि

1678 ई. में निमेजन की संधि हुई । संधि के अनुसार स्पेन का फ्रेंच कोम्टे तथा बेल्जियम के कई नगर फ्रांस को मिले । लारेन पर भी फ्रांस का अधिकार मान लिया गया। इस प्रकार लुई राइन के निकट आ गया । निमेजन की संधि से फ्रांस को तो लाभ हुआ ही किन्तु डचों को कोई विशेष हानि नहीं हुई। डच लोगों को लुई न तो सबक सिखा सका और न वह सम्पूर्ण भू-भाग पा सका जिस पर उसकी निगाहें थीं। स्पेन को इस युद्ध में सबसे अधिक हानि उठानी पड़ी।
इस सबके बावजूद यह युद्ध उसकी शक्ति का चरमोत्कर्ष था । इसके बाद फ्रांस की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी थी। ऐसी स्थिति में भी साम्राज्य विस्तार को लालायित लुई ने युद्ध बन्द नहीं किये । उसे बाद के युद्धों में इतनी भी सफलता नहीं मिली । बाद में उसे रक्षात्मक युद्ध भी करने पड़े और फ्रांस की सेनाएँ हारी भी।

(iii) ऑग्सबर्ग की लीग से युद्ध (1688-97 ई.)

लुई की नीतियों के कारण यूरोप के अधिकांश राज्य आतंकित हो गये । जर्मनी के प्रोटेस्टेन्ट राज्य एवं कुछ अन्य राज्य-स्वीडन, स्पेन, आस्ट्रिया, तथा सेवाय ‘ऑग्सबर्ग की लीग’ के नाम से संगठित हो गये । इसका मुख्य ध्येय पवित्र रोमन साम्राज्य की अखण्डता को कायम रखना तथा लुई की आक्रमणकारी नीति पर अंकुश लगाना था।
युद्ध की शुरूआत पैलेटिनेट और कोलोन के उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर हुई। दोनों स्थानों पर लुई ने फ्रांस का दावा प्रस्तुत किया । मामला पोप की मध्यस्थता के लिए सुपुर्द हुआ । किन्तु फैसला लुई के विरुद्ध हुआ।
इसी बीच एक और नयी बात हो गयी । इंग्लैण्ड की गौरवपूर्ण क्रान्ति के बाद हॉलैण्ड के विलियम को इंग्लैण्ड का शासक बनने का निमन्त्रण दिया गया । विलियम इंग्लैण्ड का राजा हो गया और लुई का परम्परागत शत्रु विलियम विरोध करने में और समर्थ हो गया।
लुई ने सितम्बर, 1688 में पैलेटिनेट पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया। इसके बाद युद्ध का क्षेत्र आयरलैण्ड बन गया । किन्तु 1690 ई. में विलियम ने जेम्स द्वितीय एवं फ्रांसीसी सेना को हरा दिया और जेम्स को भागकर फ्रांस में शरण लेनी पड़ी। इसके पश्चात् युद्ध का क्षेत्र नीदरलैण्ड बना ।

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